प्रेमानन्दजी महाराज अपने आसन पर विराजमान थे। चारों ओर भक्त शांत मन से बैठे थे। वातावरण में भक्ति की मधुर सुगंध फैली हुई थी। महाराज जी ने सहज मुस्कान के साथ कहा—
“बच्चों, जीवन में कठिन समय आना कोई नई बात नहीं है। हर इंसान के जीवन में ऐसे पल आते हैं जब मन कमजोर पड़ने लगता है। लेकिन याद रखना—कठिन समय आया है, टिकने नहीं आया।”
उन्होंने आगे समझाया—
“आज तुम जो परिस्थितियाँ देख रहे हो, चाहे वो कितनी भी भारी क्यों न लगें, उनसे घबराना नहीं है। क्योंकि समय बदलता है… और मेहनत, भक्ति और धैर्य का फल कभी व्यर्थ नहीं जाता।”
महाराज जी ने धीमी आवाज़ में कहा—
“आज तुम धर्म का, भजन का छोटा-सा बीज बो रहे हो। अभी तुम्हें उसका फल नहीं दिख रहा, इसलिए मन डगमगाता है। लेकिन जब यही बीज अंकुरित होगा, जब भक्ति का वृक्ष बनेगा… तब तुम्हारा जीवन ही बदल जाएगा।”
उन्होंने भक्तों को देखते हुए कहा—
“बहुत लोग मुश्किलें देख कर टूट जाते हैं। हालात देखकर डर जाते हैं। लेकिन समझ लो, यह समय तुम्हारी परीक्षा नहीं ले रहा… यह समय तुम्हें मजबूत बनाने आया है।”
महाराज जी ने अपना हाथ उठाकर कहा—
“जब तुम धैर्य से, श्रद्धा से, अपने धर्म के मार्ग पर चलते हो… तो याद रखना, भगवान तुम्हारे हर कदम के साथ होते हैं। आज का संघर्ष ही आने वाले कल की सफलता बनता है।”
उन्होंने आगे कहा—
“कभी सोचना नहीं कि तुम्हारी भक्ति, तुम्हारा जप, तुम्हारा भजन व्यर्थ जा रहा है। भक्ति का एक-एक क्षण तुम्हारे भविष्य में रोशनी बनकर लौटता है। बस टूटना मत… घबराना मत… यही मेरी सीख है।”
अंत में महाराज जी ने कहा—
“आज की परिस्थिति देखकर हताश मत होना। तुम्हारा मंगल निश्चित है। बस धर्म का मार्ग मत छोड़ना। भजन का बीज बोते रहना… एक दिन यही बीज तुम्हें आध्यात्मिक आनंद और अपार शांति देगा।”

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